Ethical Principles Of Research/ शोध के नैतिक सिद्धांत
- Mridula Sharma
- Jan 22, 2025
- 3 min read
Updated: Apr 19
शोध के नैतिक सिद्धांत
शोध नैतिकता शोधार्थी के लिए जिम्मेदार आचरण हेतु दिशा निर्देश एवं उच्च नैतिक मानक प्रदान करती है। शोध में मुख्य रूप से शोधार्थी को दो नैतिक सिद्धांत का आवश्यक रूप से पालन करना चाहिए -
1 शोध मे वैज्ञानिकता
2 वस्तुनिष्ठ
1 शोध मे वैज्ञानिकता
शोध में वैज्ञानिकता का तात्पर्य किसी विषय समस्या या घटना के लिए वैज्ञानिक तरीकों से तथ्यों को संकलित कर क्रमिक और संगठित ज्ञान के निर्माण से है। शोध एक प्रकार से गंभीर विचार करने का तरीका है जिसमें विभिन्न विचारों द्वारा चयनित समस्या का उत्तर निकाल कर आता है शोध में वैज्ञानिकता हेतु निम्नलिखित तत्वों का होना आवश्यक है-
1.अवलोकन- शोध अध्ययन में अवलोकन का बहुत महत्व है। शोध का क्रियात्मक पक्ष अवलोकन से शुरू होता है। शोधकर्ता घटना, विषय, घटनास्थल आदि से संबंधित तथ्यों का सूक्ष्मता और गहनता से अध्ययन करता है। यंग के अनुसार अवलोकन ‘आंखों का उद्देश्य पूर्ण अध्ययन’ है। यह शोध की वैज्ञानिकता हेतु आवश्यक घटक है।
2.सत्यापन तथा वर्गीकरण- तथ्यों का परीक्षण सत्यापन कहलाता है। सत्यापन द्वारा तथ्यों और परिणामों को प्रमाणित किया जाता है। शोध अध्ययन में तथ्यों के सत्यापन के लिए एक समान स्थिति ली जाती है और यदि दोनों प्रकृति में समान पाए जाते हैं तो प्राप्त तथ्य सत्यापित हो जाते हैं।
3.सामान्यीकरण- शोध अध्ययन में प्राप्त तथ्यों के सत्यापन के पश्चात उनका सामान्यीकरण किया जाता है अर्थात प्राप्त परिणामों को चयनित संपूर्ण क्षेत्र पर लागू किया जा सकता है।
4.भविष्यवाणी- शोध अध्ययन की भी विज्ञान के जैसे भविष्यवाणी करने की क्षमता होनी चाहिए। यदि परिणाम के आधार पर भविष्य में होने वाली घटनाओं की भविष्यवाणी की जा सके तो यह शोध की वैज्ञानिकता है। शोध अध्ययन के पश्चात प्राप्त परिणामों की पुष्टि की जाती है तो भविष्य में भी वे तथ्य बने रहते हैं। इस प्रकार शोध में भविष्यवाणी करने की क्षमता होनी चाहिए।
शोधार्थी का वैज्ञानिक दृष्टिकोण
यदि शोधार्थी शोध अध्ययन के दौरान वैज्ञानिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए शोध संबंधित तथ्यों को ससंकलित रता है तो वह शोध अध्ययन की वैज्ञानिकता को बनाए रख सकता है। शोधार्थी में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बनाए रखने के लिए पांच विशेषताओं का होना आवश्यक है-
1.वस्तुनिष्ठता- शोध कार्य शोधार्थी की व्यक्तिगत पसंद दृष्टिकोण रुचि प्रवृत्तियां एवं आशंकाओं सेप्रभावित न हो, इसे वस्तुनिष्ठ कहा जाता है। अध्ययन के दौरान शोधार्थी को घटनाओ का अध्ययन उनके वास्तविक स्वरूप में करना चाहिए। शोधार्थी निष्पक्ष रहते हुए शोध की वस्तुनिष्ठ बनाए रख सकता है।
2.धैर्य- शोधकर्ता पर शीघ्र अध्ययन करने कार्य समाप्त करने के लिए कई बार अत्यधिक दबाव का सामना करना पड़ता है लेकिन उसे कभी भी कोई कार्य जल्दबाजी या दबाव में आकर नहीं करना चाहिए। तथ्यों को एकत्रित करने, निष्कर्ष निकलना, रिपोर्ट प्रस्तुत करने आदि में जल्दबाजी न करके धैर्यतापूर्वक अपने शोध कार्य को अंजाम देना चाहिए जिससे त्रुटि की संभावनाएं कम हो सके।
3.कठोर परिश्रम- शोध कार्य कोई सरल कार्य नहीं है। प्रकृति के रहस्य या सामाजिक घटनाओं को समझना कठिन कार्य है। इसके लिए शोधार्थी में बहुत अधिक लग्न तथा कठोर परिश्रम करने की इच्छा शक्ति होनी चाहिए।
4.जिज्ञासु दृष्टिकोण- शोधकर्ता को सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ विभिन्न तथ्यों की खोज तब तक करते रहनी चाहिए जब तक कि वह विषय से संबंधित सभी तथ्यों को प्राप्त न कर ले और उनका सत्यापन ना कर ले।
5.रचनात्मक चिंतन शक्ति- शोधार्थी के लिए तथ्य एकत्रित करना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उन्हें उनके अर्थो, परिणाम और इन तथ्यों के आधार पर क्या सिद्धांत बनाए जा सकते हैं इसके बारे में जिज्ञासु होना चाहिए।
BY- Dr. Mridula Sharma
Associate Professor/Research Guide/Academic Consultant
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